Saturday, 7 December 2013

मैकाले का षड्यंत्र : भारतीयता की हत्या

मैकाले का षड्यंत्र : भारतीयता की हत्या
by Ankit Therealscholar on 01 मार्च 2011 को 09:39 बजे

कुछ लोगों का मानना है की हमें लार्ड मैकाले का आभारी होना चाहिए की उसने भारत को आधुनिक शिक्षा प्रणाली (?) दी थी ,, हाँ मैकाले ने एक शिक्षा प्रणाली अवश्य दी थी परन्तु ऊस कथित शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य भारत और हिंदुत्व की आत्मा की हत्या था | यह एक षष्ट था भारत और भारतीयता की जड़ों पर प्रहार का | इस प्रणाली की स्थापना के पीछे मैकाले की मूल भावना क्या थी इस बात को दिखने के लिए मैं मैं काले के द्वारा उसके पिता को दिनांक 12 - 10 -1836 को लिखे गए पात्र का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ

"हमारे अंगरेजी विद्यालय आश्चर्यजनक ढंग से प्रशस्त हो रहे हैं | हिन्दुओं पर इनकी शिक्षा का अद्भुत प्रभाव पड़ रहा है | कोई भी हिन्दू , जिसने अंगरेजी शिक्षा पायी हो , अपने धर्म के प्रति निष्ठावान नहीं रहता | इनमे से कुछ और्प्चारिक्तावश हिन्दू बने रहते हैं तो कुछ इसाई बन जाते हिं | मेरा द्रिड विशवास है की यदि हमारी शिक्षा योजना इसी तरह जारी रही तो आगामी तीस वर्षों में बंगाल के संभ्रांत हिन्दू परिवारों में एक भी मूर्तिपूजक बाकी नहीं बचेगा | यह धर्मान्तरण की प्रक्रिया बिना प्रयत्न किये , बिना धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किये , स्वाभाविक ढंग से स्वतः पूर्ण हो जाएगी | मुझे इस योजना से बड़ी खुशी हो रही है |"(सन्दर्भ "aryans who were they ?" लेखक श्री राम साठे)

भले ही मैकाले की आशाअनुरूप सफलता न मिली हो इस षड्यंत्र को परन्तु इस पात्र के इस शिक्षा प्रणाली का मूल लक्ष्य आसानी से समझा जा सकता है और यह शिक्षा प्रणाली करक है बहुत सी समस्याओं की क्योंकी इसके उत्पादों में से बहुत से यह मानते हैं की जो कुछ भारतीय है वो ख़राब अहि निकृष्ट है और भारत के पास तथा भारतीय संस्कृति के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर गर्व किया जा सके | वो लोग स्वयं को भारतीय के स्थान पर इन्डियन कहलाना पसंद करते हैं और प्रेरणा के लिए विदेशों की तरफ देखते हैं | ये एक वैचारिक युद्ध की तरह है जिसमे की हमें संघर्ष की आवश्यकता है क्यूँकी अगर इस युद्ध में हम पराजित हो गए तो इस पराजय का अर्थ होगा भारतीयता और भारत की पराजय |

वन्दे मातरम |

कश्मीर के विस्थापित हिन्दू

21 साल बाद भी घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों के दर्द पर मुफीद मरहम नहीं रखा जा सका है.
जन्मभूमि किसे प्यारी नहीं होती. लेकिन जबरन जन्मभूमि छोड़नी पड़े, इससे बड़ा दर्द शायद ही कोई हो. आतंक की वजह से कश्मीरी पंडित विस्थापित तो जरूर हो गए लेकिन उन्हें अपने घर की याद अब भी सताती है. विस्थापित कश्मीरी पंडितों का वह दर्द 21 वर्षों बाद आज भी जिंदा है और वह अपने घर लौटना चाहते हैं.
पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा
19 जनवरी 1990 यानी 21 साल पहले आज ही के दिन कश्मीर की घाटी में बसने वाले तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों के परिवार को सीमा पार के आतंकवादियों की साजिश के चलते जबरन अपना घर-बार छोड़कर रातों रात भागना पड़ा था.
19 और 20 जनवरी 1990 की रात जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में पाकिस्तान की शह पर भेजे गए आतंकवादियों और कुछ स्थानीय नागरिकों की मिलीभगत से कश्मीर की घाटी में हजारों साल से बस रहे एक खास समुदाय को जल्द से जल्द घाटी में अपना घर-बार छोड़कर भाग जाने का फरमान सुना दिया गया. रात भर चली नारे बाजी और कत्लेआम इतना खौफनाक था कि जिसे जैसे ही मौका मिला और जो जिस हालत में था उसी में वहां से भाग निकला.
इसके चलते एक रात में कश्मीर की घाटी में बसने वाले तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों को अपनी मिट्टी, अपना घर, पैसा, सोना-चांदी, अपना व्यापार सबकुछ छोड़कर जाना पड़ा था.
कश्मीरी पंडितों के साथ-साथ हमारे सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कश्मीरी पंडितों के पलायन करवाने में पाकिस्तान की साजिश थी. वह कश्मीर के कई इलाकों से ऐसे लोगों को हटाना चाहता था जो उसके लिए रुकावट पैदा कर सकते थे. उसने आपस में फूट कराई और कई इलाकों में दंगे भी करवाए.
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान ने एक योजना बनाकर इस पूरी साजिश को अंजाम दिया और कश्मीरी पंडितों को पलायन करने के लिए मजबूर किया. लेकिन जानकारों का यह भी मानना है कि सब जानते हुए भी सरकार कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा नहीं दे पाई. यह हमारी सरकार की असफलता थी.
कश्मीरी पंडितों का मानना है कि उन्हें गिला पाकिस्तान और आतंकवादियों के साथ-साथ अपनी सरकार से भी है. क्योंकि संकट के समय इन लोगों के साथ न तो केंद्र सरकार खड़ी हुई और न ही राज्यसरकार.
कश्मीर की समस्या चाहे जब खत्म हो लेकिन कश्मीर की जमीन से जुदा लोगों की उम्मीद हर एक दिन हर एक नई सुबह के साथ शुरू होती है. लेकिन एक कभी न खत्म होने वाले इंतजार के साथ हर दिन चलती जाती है.

महात्मा गांधी : अहिंसा का पुजारी या 1919 के हिन्दुओं के नरसंघार का नेतृत्वकर्ता

नकली महात्मा का असली चेहरा


मोहनदास करमचन्द्र गाँधी (कुछ के लिए महात्मा ) , उसे आधिकारिक रूप से तो भारत का राष्ट्रपिता कहा जाता है परन्तु उस व्यक्ति ने भारत की कितनी और किस तरह से सेवा की थी इस सम्बन्ध में लोग चर्चा करने से भी डरते हैं | गांधी के अनुयायी गांधी का असली चेहरा देखना ही नहीं चाहते हैं क्यूँकी वो इतना ज्यादा भयानक है उसे देखने के लिए गांधीवादियों को सहस जुटाना होगा | सभी गांधीवादी , महात्मा गांधी (??) को अहिंसा का पुजारी मानते हैं जिसने कभी भी किसी तरह की हिंसा नहीं की परन्तु वास्तविकता तो यह है की बीसवी सदी के सबसे पहले हिन्दुओं के नरसंघार का नेतृत्व इसी मोहनदास करमचन्द्र गांधी ने किया था |



मैं जिस नरसंघार के बारे में बता रहा हूँ वो 1919 में हुआ था और इस घटना को इतिहास की किताबों (जो की कम्युनिस्टों ने ही लिखी हैं ) खिलाफत आन्दोलन के नाम से पुकारा जाता है और ये भी पढाया जाता है की ये खिलाफत आन्दोलन राष्ट्रीय भावनाओं का उभार था जिसमे देश के हिन्दुओं और मुसलमानों ने कंधे से कन्धा मिलकर भाग लिया था परन्तु इस बारे कुछ नहीं बताया जाता है एक विदेशी शासन और वहां की सत्ता का संघर्ष का संघर्ष भारत के राष्ट्रीय भावनाओं का उभार कैसे हो सकता है ? खिलाफत आन्दोलन एक विशुद्ध सांप्रदायिक इस्लामिक चरमपंथी आन्दोलन था जो की इस भावना से संचालित था की पूरी दुनिया इस्लामिक और गैर इस्लामिक दो तरह के राष्ट्रों में बटी हुई है और पूरी दुनिया के मुस्लिमों ने, तुर्की के खलीफा के पद को समाप्त किये जाने को गैर इस्लामिक देश के इस्लामिक देश पर आक्रमण के रूप  में देखा था | खिलाफत आन्दोलन एक इस्लामक आन्दोलन था जो की मुसलमानों के द्वारा गैर मुस्लिमों के विरुद्ध शुरू किया गया था और इसे भारत में अली बंधुओं ने नेतृत्व प्रदान किया था |

मोहनदास करमचन्द्र गांधी जो की उस समय कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे , उसने इस खिलाफत आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की | ध्यान रहे की खिलाफत आन्दोलन अपने प्रारंभ से ही एक हिंसक आन्दोलन था और इस अहिंसा के कथित पुजारी ने इस हिंसक आन्दोलन को अपना समर्थन दिया (ये वही अहिसा का पुजारी है जिसने चौरी चौरा में कुछ पुलिसकर्मियों के मरे जाने पर अपना आद्नोलन वापस ले लिया था ) और इस गम्न्धी के समर्थन का अर्थ कांग्रेस का समर्थन था | इस खिलाफत आन्दोलन के प्रारंभ से इसका स्वरूप हिन्दुओं के विरुद्ध दंगों का था और गांधी ने उसे अपना नेतृत्व प्रदान करके और अधिक व्यापक और विस्तृत रूप दे दिया |

इस अहिसा के पुजारी की महत्वकांक्षा (या कुछ छिपे हुए अन्य स्वार्थ या कारन) हजारों हजार हिन्दुओं के लाशों पर चढ़ कर राष्ट्र का सबसे बड़ा नेता बनाने की थी और इस लिए इसने मुस्लोमों के द्वारा किये गए इस हिन्दूनरसंघर का भी नेतृत्व कर दिया ताकि मुस्लिम खुश हो जाएँ परन्तु यही नहीं था जो इसने किया जब अली भाइयों ने अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया था तब इस कथित अहिंसक महात्मा ने कहा था"यदि कोई बाहरी शक्ती इस्लाम की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए और न्याय दिलाने के लिए आक्रमण करती है तो वो उसे वास्तविक सहायता  न भी दें तो उसके साथ उनकी पूरी सानुभूति रहेगी "(गांधी सम्पूर्ण वांग्मय - १७.५२७- 528)| अब यह तो स्पस्ट ही है की वो आक्रमणकर्ता हिंसक ही होता और इस्लाम की परिपाटी के अनुसार हिन्दुओं का पूरी शक्ती के साथ कत्लेआम भी करता | तो क्या ऐसे आक्रमण  का समर्थन करने वाला व्यक्ती अहिंसक कहला सकता है ??


बात इतने पर भी ख़तम नहीं होती है , जब अंग्रेजों ने पूरी दुनिया में इस आन्दोलन को कुचल दिया और खिलाफत आन्दोलन असफल हो गया तो भारत के मुसलमानों ने क्रोध में आकर पूरी शक्ती से हिन्दुओं की हत्यां करनी शुरू कर दी और इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मालाबार क्षेत्र में देखा गया था | जब वहां पर मुसलमानों द्वरा हिन्दुओं की हत्याएं की जा रही थीं तब इस मोहनदास करमचन्द्र गांधी ने कहा था ".अगर कुछ हिन्दू मुसलमानों के द्वारा मार भी दिए जाते हैं तो क्या फर्क पड़ता है ?? अपने मुसलमान भाइयों के हांथों से मरने पर हिन्दुओं को स्वर्ग मिलेगा ...." |

मुझे लगता है की अब समय आ गया है की हम एक बार पुनः सभी चीजों को देखें और इस बात का निर्णय करें की क्या वास्तव में यह व्यक्ती "अहिंसा का पुजारी " और "देशभक्त" कहलाने के योग्य है या इसको देखभक्त कहना देशभक्तों का अपमान है ??

आर्य आक्रमण की कल्पना -- मात्र एक कुटिल कल्पना


आर्य जाती और आर्यों का आक्रमण है एक मिथक जिसे अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ और अपनी काल्पनिक श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए और आज कुछ लोग अपने छुद्र निजी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उस असत्य का प्रयोग कर रहे हैं और अपने निजी स्वार्थों के लिए उस कल्पना को जीवित रखना चाहते हैं जिसके पक्ष में कोई भी प्रमाण नहीं है | कोई भी ऐसा प्रमाण नहीं है जिसे आर्य नमक जाती , आर्यों का आक्रमण भारोपीय भाषा या किसी भी ऐसी कल्पना का अस्तित्व सिद्ध होता हो |

आर्य आक्रमण सिद्धांत की सबसे पहली कल्पना ये कहती है की सिन्धु घटी सभ्यता आर्यों से पहले की सभ्यता है आर्यों 1500 ईसा पूर्व उसे आक्रमण करके नष्ट कर दिया था परन्तु आर्यों के इस काल्पनिक आक्रमण के काल और सिन्धु घाटी सभ्यता (जो की वास्तव में सिन्धु सरस्वती सभ्यता है) के अंत के बीच में 250 वर्षों का अंतर है |
इसके अतिरिक्त सिन्धु घाटी के अवशेषों में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं मिला है जो की ये सिद्ध करे की इसका अंत किसी आक्रमण के कारण हुआ था | वहां जो भी मानव अस्थि अवशेष मिले हैं वो सभ्यता के मध्य काल के हैं ना की अंत काल के इसके अतिरिक्त उन पर ऐसे कोई निशान नहीं जिससे पता लगे की उनकी हत्या हुई थी |

इस सिद्धांत का दूसरा तथ्य ये कहता है की आर्य श्वेत वर्णी और स्वर्णकेशी थे परन्तु कोई इस बारे में बात नहीं करता है की आर्य श्रेष्ठ राम और कृष्ण काले क्यों थे | इसके अतिरिक्त अगर नेदों के रचनाकार ऋषि श्वेत वर्णी होते तो कम से कम उनके अन्दर श्वेत वर्ण के प्रति आकर्षण तो होना चाहिए था परन्तु ऋग्वेद ११-३-९ में कहते हैं "त्वाष्ट्र के आशीर्वाद से हमारी संतान पिशंग अर्थात गेहूं के रंग के पीले भूरे हों "

एक अन्य तर्क के अनुसार आर्य मूर्ती पूजा के विरोधी थे और केवल यज्ञ करते थे जब की सिन्धु घाटी के निवासी केवल मूर्ती पूजा करते थे |परन्तु सिन्धु घटी के नगरों में भी यज्ञ शालाएं मिली हैं तथा ऋग्वेद ४-२४-१० में कहा गया है "हे इंद्र मैं तुझे हजार पर भी नहीं बेचूंगा दस हजार पर भी नहीं " अतः इंद्र को नई इंद्र की मूर्ती को ही बेचा जा सकता है | कुछ लोग कहते हैं वेदों में मूर्ती पूजा की निंदा की गयी है परन्तु पुरानो में तो यज्ञ को "हजार छिद्रों वाली नौका" कहा गया है | वास्तव में हमारी संस्कृति में विचारधाराओं में अंतर का सदैव सम्मान किया गया है परन्तु ईसाई और इस्लामिक कट्टरता में फसे हुए लोग इस बात को कैसे स्वीकार कर सकते थे ???


इसी श्रंखला में एक काल्पनिक भारोपीय भाषा की कल्पना कर ली गयी जिसका कोई भी प्रमाण नहीं मिला | इस तथ्य की अवहेलना की गयी की संस्कृत सभी भारतीय भाषाओँ की जननी है तथा कुछ काल्पनिक सिद्धांतों के आधार पर भारत की भाषाओँ को आर्य भाषा तथा द्रविड़ भाषाओँ में विभाजित कर दिया गया परन्तु यदि उन्ही सिद्धांतों के आधार पर परीक्षण करें तो संस्कृत ६०% , मराठी ८०% तथा हिन्दी तो १०० % द्रविड़ भाषा है |


वेदों में सर्वत्र भारत भूमि का ही वर्णन आया है इससे ये सिद्ध होता है वेद भारत भूमि में ही रचे गए हैं परन्तु वेदों में कपास का वर्णन नहीं हैं जबकी इसका उपयोग सिन्धु घटी सभ्यता में होता था अतः यह स्वयं सिद्ध है की वेद सिन्धु घटी सभ्यता से अत्यंत प्राचीन हैं और इससे यह निष्कर्ष निकला जा सकता है की < >वेदों के रचनाकार ऋषि कथित आर्य आक्रमण से कहीं पूर्व में भारत में ही थे |


वास्तव में आर्य कोई जाती समूह नहीं था और ना ही कोई नस्लीय समूह आर्य का वही अर्थ है जो की आज "सभ्य" शब्द का था और सिन्धु घटी सभ्यता वास्तव में आर्यों की ही सभ्यता थी और वेद भी उनकी ही कृति थे |आर्य ना तो घुमक्कड़ थे और ना ही आक्रान्ता आपितु वो कृषि कर्म करने वाले और भारत की भूमि के ही निवासी थे और आज भी उनके ही वंशज यहाँ रह रहे हैं | "आर्य - द्रविड़" या "आर्य-मूलनिवासी " विभाजन पूर्णतयः एक काल्पनिक विभाजन है |

लव जिहाद' - एक जेहादी संगठनों के लिए लड़कियों को फंसाने के हिंदू


थानामथिट्टा (केरल: कुछ दिन पहले एक धर्मनिरपेक्ष मलयालम दैनिक, केरल कौमुदीनामक जिहादी संगठन के एक उजागर चौंकाने वाला खुलासे के बारे में 'लव जिहाद' जो आसानी से कर दिया गया है मीडिया के बाकी अनदेखा करके.
फँसाने अनुभवहीन गैर मुस्लिम लड़कियों (पढ़ें के रूप में हिंदू लड़कियों) प्यार  के जाल में इस्लाम में परिवर्तित करने के लिए काम करने का ढंग है संगठन ने कहा. पहले से ही 4000 से अधिक लड़कियों को इस जेहादी Romeos द्वारा किया गया है इस्लाम में परिवर्तित.


पुलिस की विशेष शाखा जांच जब इतने बड़े पैमाने के विवाह पिछले 6 महीनों में रिपोर्ट कर रहे हैं शुरू कर दिया. इस संगठन के रंगरूटों को निर्देश के अनुसार, वे करने के लिए 2 सप्ताह की समय सीमा के भीतर एक हिंदू लड़की से प्यार है और उनके विचार बदलने में बदल पाने के लिए और 6 महीने के भीतर से शादी की है. विशेष निर्देश कम से कम 4 बच्चों को भी दिया गया है नस्ल को. यदि लक्ष्य पहले 2 हफ्तों के भीतर नहीं फंस जाएगा, तो वे उन्हें छोड़ दो और एक और लड़की पर स्थानांतरित करने के निर्देश दिए हैं.

कॉलेज के छात्रों और काम लड़कियों प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए. एक बार अपने मिशन संगठन को कारोबार शुरू युवाओं के लिए 1 लाख रुपये और वित्तीय सहायता दे देंगे पूरा किया. मुफ्त मोबाइल फोन, बाइक और फैशनेबल कपड़े मिशन के लिए उपकरण के रूप में उन्हें पेशकश कर रहे हैं.

इस लव जिहाद के लिए धन मध्य पूर्व से आता है. प्रत्येक जिला अपने ही क्षेत्र अध्यक्ष को मिशन की निगरानी है. कॉलेज प्रवेश करने से पहले वे हिंदू लड़कियों और उनके विवरण की एक सूची बनाने और लक्ष्य उन जिसे वे कमजोर करने के लिए और brainwashed होना आसान लग रहा है.

यह एक पूरे के रूप में हमारे सेकुलर तक माता पिता और हिन्दू समाज को   तय करना होगा कि वे अपने बेटे और बेटियों पर हो रही इन बुरी कर्ता द्वारा लक्षित पहले सनातन धर्म के लोकाचार विकसित करना चाहिए| एक मार्क्सवादी है विधायक की बेटी की कहानी है जो (Maligning हिंदू संगठनों के लिए हालांकि) भी राष्ट्रीय सुर्खियों में केवल हिमशैल  का जल के बहार का हिस्सा है. 

भारत की स्वतंत्रता - ब्रिटिश राज और गाँधी

15 अगस्त  1947 की घटना को 60  वर्ष से भी ज्यादा समय हो चूका है| आज की लगभग पूरी भारतीय जनसँख्या स्वतंत्रता के बाद पैदा हुई है जिसने कुछ देखा नहीं और उसी को सच मान लिया हिया जो सरकारों ने उसे बताया  और इन 60 वर्षीं में सरकारी तंत्र ने अपनी पुरी क्षमताएं लगा दी कुछ बातें समझाने में जैसे की 15 अगस्त को भारत स्वतन्त्र हो गया है , हमारा संविधान भारतीयों ने बनाया था और मोहनदास करमचंद गाँधी (सरकारी शब्दों में राष्ट्रपिता महात्मा )  ने देश को स्वतंत्रता दिलाई और वो भी बिना शास्त्रों की सहायता लिए बिना | पिछले 60 वर्षों से हमें मिठाई खिला खिला कर साल में 3  या  4 बार ये बातें बताई जाती हैं और वास्तिविकता को छिपाया जाता रहा है आइये कुछ तथ्यों को देख लें और उसके बाद आप स्वयं निर्णय करें |

सबसे पहले ये देखते हैं की 15 अगस्त 1947 की घटना क्या वास्तव के स्वतंत्रता थी या सत्ता हस्तानान्तरण ?? आज हमारे संविधान की अधिकांश (लगभग ९५% ) बातें वही हैं जो की अंग्रेजों के द्वारा बनाये गए Govt. of India ACT 1935  में थीं | दूसरी बात भारत में जो शिक्षा व्यवस्था  मैकाले ने बनाई थी वो भारतीयता की हत्या करने के लिए बनाई थी आज भी वही शिक्षा व्यवस्था चल रही है | आज भी भारत में अधिवालता और न्यायाधीश  कला कोट पहनते हिं जबकी भारत एक गर्म देश है ,आज भी जब कहीं डिग्रियां मिलती हैं तो एक भरी गाउन पहनते हैं लोग जो की कम से कम भारत में तो सुविधाजनक नहीं है | दिल्ली के INDIA GATE में आज भी उन सैनिकों के नाम लिखे हैं जो जो ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठ थे न की भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वालों के | आज  भी देश भर में कई विद्यालय और महाविद्यालय अंग्रेजों के नाम पर हैं और आज भी सरकारी कार्यों की भाषा अंगेजी हैं कोई भारतीय भाषा नहीं | आज भी हमारी दंड संहिता , नागरिकता का अधिनियम अंग्रेजों का बनाया हुआ है और इन सबसे आगे हमारे देश का नाम भारत नहीं "INDIA that is BHARAT"  है | तो प्रश्न यह है की इस तंत्र में स्व है कहाँ और अगर स्व नहीं है तो हम स्वतन्त्र कहाँ हैं ?? क्या यह स्वतंत्रता छद्म नहीं है ???
अब इसके बाद ये देखते हैं की इस कथित स्वतंत्रता को दिलाने का श्री भी क्या मोहनदास करमचंद गाँधी को जाता है ?? अगर गाँधी वास्तव में अंग्रेजों के इए खतरा थे तो अंग्रेजों ने गांधी को कोई दंड क्यूँ नहीं दिया ?? इसके अतिरिक्त गांधी जी का कोई भी आन्दोलन कभी सफल नहीं हुआ तो अंग्रेज गाँधी के कहने पर देश छोड़ कर क्यूँ चले जायेंगे ?  गाँधी का अंतिम आन्दोलन 1942 में हुआ था जिसको कुछ ही समय में कुचल दिया गया था और उसके बाद गाँधी ने कोई आन्दोलन नहीं किया तो क्या अंग्रेज ४  वर्ष पुराने आन्दोलन से भयभीत हो गए थे और जो अंग्रेज अपने दमन चक्र के लिए कुख्यात थे वो ऐसे आंदोलनो से दर गए थे ? क्या कांग्रेस से अलग जो लोग थे उन्होंने कोई आन्दोलन नहीं किया था और एक मात्र गाँधी के कारन अंग्रेज भाग गए ?? जो गाँधी कभी भी एक मुस्लिम के हाथ से तलवार नहीं छुड़ा पाए वो क्या अंग्रेजों से देश आजाद करवा सकते थे ??

ये दावे हास्यास्पद लगते हैं सब हम स्थितियों का सही विश्लेषण करते हैं | अंग्रेजों को यह अनुभूति होने लगी थी की अब भारत पर शासन करना संभव नहीं है और भारत की जनता जाग्रत हो रही है सेना और पुलिस में भी अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश पनप रहा था और एक और 1857  आ सकता था इसीलिए अंग्रेजों ने स्वयं शासन करने की बाजे भारत की सत्ता अपनी कुछ कठपुतलियों को देने का निर्णय किया था  और इसके बदले में किसी को राष्ट्रपिता और किसी को प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया  बाकी राज तो आज भी उन्ही का चल रहा  है|

पहले सोमनाथ फिर विश्वनाथ और अब पद्मनाभ

एक और हिन्दू मंदिर को लूटने के प्रयास


भारतीय संस्कृति में धर्म का एक विशेष महत्त्व रहा है और इसी लिए दान का भी महत्त्व रहा है |हमारे मंदिरों की सम्रद्धि सदैव से लुटेरों के आक्रमण का केंद्र रही है पहलेमुस्लिम आक्रान्ताओं के सोमनाथमंदिर को कई बार लुटा और अब इस्लामिक और ईसाई गटबंधन केरल के पद्मनाभ मंदिर को लूट रहा है और देश के हिन्दू ये देख ही नहीं पा रहे हैं की उनकी संपत्ति को छिना जा रहा है जो की बाद में इस्लाम और ईसाइयत के प्रचार में लगाई जाएगी | हिन्दू मंदिरों की संपत्ति से जेहादी शस्त्र खरीदेंगे और मिशनरी इसी धन की सहायता से धर्मान्तरण कार्य करेंगे |

कुछ लोग ये तर्क दे रहे हैं की यह धन देश का है और इस लिए देश के कल्याण और विकास में खर्च किया जाना चाहए परन्तु उन लोगों की कभी भी यह तर्क मस्जिदों और मजारों के धन के देने की हिम्मत नहीं होती है | कभी यह नहीं कहा जाता है हज यात्रियों पर जो धन खर्च किया जाता है उसे देश के विकास में लगाया जाय क्यों की पता है की ऐसा करते ही फतवे भी निकल सकते है
और तलवारें भी (जिस तरह से एक ईसाई शिक्षक का हाथ काटा गया) परन्तु हिन्दू मंदिरों की सम्रद्धि पर इन लोगों की गिद्ध दृष्टी लग गयी है |

सबसे पहली बात तो यह की ये जो धन मिला है ये भगवन पद्मनाभ का है तो इसका राष्ट्रीयकारण क्यों किया जाना चाहिए वह भी उस समय में जब की सभी सरकारी चीजों का निजीकरण किया जा रहा है ?? यह धन भगवान पद्मनाभ का धन है तो इसे भगवान पद्मनाभ के भक्तों के कल्याण में लगाया जाना चाहिए ना की भगवान के मंदिरों के लुटेरों के कल्याण में | इसके अतिरिक्त जिन लोगों ने यह धन दान में दिया था वो हिन्दू थे और उन्होंने यह धन मंदिर को दिया था ना की किसी सरकार को इस लिए इस धन पर मंदिर का ही अधिकार है | इसके अतिरिक्त कुछ लोग इस धन की तुलना विप्रो या किसी कोरियाई कंपनी की संपत्ति से कर रहे हैं तो विप्रो की संपत्ति का निवेश कैसे करना है ये विप्रो निर्धारित करती है और कोरियाई कंपनी यह निर्धारित करती है की उस संपत्ति का निर्धारण कैसे करना है तो पद्मनाभ मंदिर के ट्रस्ट को मिलाना चाहिए |

इसके अतिरिक्त कुछ लोग कह रहे हिं की इस धन को गरीबों के कल्याण के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए | जब लोग कहते हैं गरीबों के कल्याण के लिए तो उनका मतलब मुस्लिम होता है | केरल के तो के मंत्री ने इस धन को "गरीबों और अल्पसंख्यकों " पर खर्च करने की मांग भी कर दी है | मुस्लिमों की गरीबी उनके स्वयं के द्वारा उत्पन्न की गयी परिथितियों की दें होती है , मुस्लिम औरतें बच्चे पैदा करने की मशीन से अधिक कुछ नहीं होती हैं और मुस्लिम पुरुष उनको जेहादी और दंगाई बनाते हैं | मुस्लिम महिलाएं आतंक के लिए कच्चे माल का उत्पादन करती हैं और मुस्लिम पुरुष उस कच्चे माल को शाश्त्र में परिवर्तित करते हैं | यही उनकी नियति है क्यूँकी यही उनका धर्म है |मुस्लिमों के तो देश की आर्थिक स्थिति नहीं सुधर सकी है क्योंकी इस बुरी स्थिति का कारण उनके धर्म में है | उत्पादन में मुस्लिमों का सहयोग नगण्य ही होता है इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नई होती है और जो कुछ धन होता भी है तो केरल के मुस्लिम वो धन लव जेहाद जैसे कार्यक्रमों पर खर्च करते हैं और हिन्दू शर्मनिरपेक्ष यह मांग कर रहे हैं की स्वामी पद्मनाभ का धन "लव जेहादियों" को दे दिया जाय ताकि वो और तेजी से लव जेहाद कर सकें ??

अब प्रश्न यह है की इस धन का किया क्या जाय ?? यह धन पद्मनाभ मंदिर का है तो इसे मंदिर के अन्दर ही रहना चाहिए | वहां पर एक संग्रहालय बनाया जा सकता है जहाँ पर इस सब वस्तुओं को प्रदर्शन के लिए रखा जा सकता है | ये सभी वस्तुएं एतिहासिक महत्त्व की हैं तो इनके प्रदर्शन मात्र से मंदिर प्रशासन को आय हो सकती है और उसके बाद इस आय का उपयोग लव जेहाद पीड़ितों के पुनर्वास एवक उनको न्याय एवं सुरक्षा दिलाने के लिए आवश्यक प्रक्रिया में किया जाना चाहिए |