Saturday, 7 December 2013

इंटरनेट पर संस्कृत के साधन

कंप्यूटर के युग में 'संस्कृत भाषा' की महत्ता एक बार फिर से परिभाषित हो रही है । भाषा विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करने वाले विश्व के कई विशेषज्ञ देवभाषा संस्कृत का सम्मान विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा के रूप में करते हैं । कंप्यूटर के संचालन के लिए संस्कृत सर्वश्रेठ भाषा है ये भी एक स्थापित तथ्य है । प्राचीनतम शास्त्रों और सिध्दातों की अभिव्यक्ति का माध्यम रही ये भाषा नई तकनीक और विज्ञान को भी एक नई दिशा देने में समर्थ हैं  |

ये  कुछ वेबसाइट और ब्लॉग पते हैं जहाँ पर संस्कृतप्रेमी अपने आप को संस्कृतमय कर सकते हैं




आशा  है , आपको मेरा प्रयास पसन्द आएगा |

हो न्याय अगर तो आधा दो ,और उसमे भी यदि बाधा हो

सर्वप्रथम  तो न्यायलय के इस निर्णय में लोगों को विसंगतियां नजर आ रही हैं |क्या कवल इस लिए की यह निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आया है ? मैं अधिवक्ता तो नहीं हूँ अतः मुझे न्यायिक सूक्ष्मताओं का ज्ञान नहीं है परन्तु साड़ों से चली आ रही आस्थाएं क्या स्वयं ही इस बात साक्ष्य नहीं हैं ? क्या उस अस्जिद का नाम १९४० तक "मस्जिदे - जन्मस्थान " होना प्रमाण नहीं है ?क्या निकट भूत में बामियान का कार्य इस्लामिक आक्रान्ताओं के मूल चरित्र को नहीं दर्शाता है? इसके अतिरिक्त जब अयोध्या का मुस्लोमों के लिए कोई विशिस्ट धार्मिक महत्त्व नहीं है तो क्या अयोध्या हिन्दुओं को देना विसंगति है ?

दूसरी बात ,अगर सामाजिक सद्भाव बना हुआ है तो मैंने ऐसा लेख क्यूँ लिखा है ? कहाँ है सामाजिक सदभाव ?इस निर्णय के आने से पहले जो लोग सामाजिक सदभाव बनाये रखने की अपील कर रहे थे वो ही अब इस निर्णय में लोकतंत्र की पराजय देखने लगे हैं |और शान्ति ..............कहीं ते तूफान के पहले वाली तो नहीं है ?सरे कट्टर पंथी मुस्लिम ब्ल्लोगारों ने इस निर्णय की आलोचना करना प्रारंभ कर दिया है | और सरे प्रगतीशील  और धर्मनिरपेक्ष लोग भी धीरे धीरे इसके विरोध  में उतरने लगे हैं |पाकिस्तान तक में इस पर मुस्लिम एकत्रित होने लगे हैं | वैसे जो लोग सोचते हैं  की हिन्दू मुस्लिम सदभाव जैसी कोई चीज वास्तविक दुनिया में होती है तो हमे कुछ उदहारण दें जब मुस्लिमो के अन्य धर्मावलम्बियों  से अधिक शक्तिशाली होने के पश्चात भी शांति रही हो ? पूरे  एशिया और यूरोप में ५०० वर्ष तक बहने वाली खून की नदियाँ ही क्या वो सदभाव  हैं जिसके सम्मान की अपेक्षा हमसे की जा रही है ?

तीसरी बात , अयोध्या में मंदिर और मस्जिद  दोनों बनाने की बात कह रहे हैं | कह रहे हैं की कुछ स्थान मुस्लिमों को बाबरी मस्जिद के लिए भी दे दिया जाये | ठीक है हम दे देंगे और देश के हर हिन्दू को हम मनाएंगे और उस मस्जिद के निर्माण के लिए चंदा एकत्रित करके हाँ भी हम देंगे | भव्य मस्जिद बनेगी | बस आप लोग हमे काबा के बगल में ५० ५० का स्थान दिला दीजिये मंदिर बनाने के लिए | उस नगर में तो अमुस्लिमों का प्रवेश भी वर्जित है तो हम अयोध्या में उनको   त्रण  की नोक के बरबा बोमी भी क्यूँ दें |

कुछ लोग कहेंगे की ऐसा करके हम उन मुस्लिमों  का दिल जीत सकते हैं| तो आप उनका दिल अपने घर का एक तिहाई , राजघाट का एक तिहाई और तीन मोरती भवन का एक तिहाई देकर क्यूँ नहीं जीत लेते हैं ? इतिहास हमे सिखाता है की हम इतिहास  से कुछ नहीं सीखते हैं और इसी लिए अपने आप को इतिहास दोहराता है | इतिहास साक्षी है इस बात का की मुस्लिमों  का दिल जीतना संभव नहीं है क्यूँकी दिल तो उनका जीता जायेगा जिनके पास दिल होगा |तो क्या हमे पुनः वाही भूलें करनी चाहियें या इतिहास से कुछ सीखते हुए इस बार कुछ अलग करना चाहिए |

हमे लेशमात्र भी आश्चर्य नहीं होगा अगर एक तिहाई हिस्से को रख ने के बाद मुस्लिमों में "हस के लिया है एक तिहाई लड़ कर लेंगे दो तिहाई "की गोंज सुने देने लगे क्यूँ की यही मुस्लिमों का चरित्र है |और न्याय की भी यही मांग है की अब जबकि भारत की किसी विदेशी  आक्रान्ता का शासन  नहीं है तो  हिंडून की समस्त संपत्तियां हिन्दुओं की वापस की जाएँ को आक्र्न्ताओं ने छीन  ली थी |

 आप सभी से अनुरोध है की इस पर अपने विचार दें पर दीपा शर्मा जी पर व्यक्तिगत टिप्पड़ी किये बिना |

और अंत में हिन्दू कुश पर्वत से हिन्दुमाहोदाधि तक का पूराक्षेत्र  हिशों का था जिस पर मुस्लिम आक्रान्ताओं के कब्ज़ा किया था तो अब कम से कम हमारे पूजास्थल तो हमे वापस कर ही दिए जाने चाहिए |

हो न्याय अगर तो आधा दो ,और उसमे भी यदि बाधा हो
तो दे दो केवल पांच ग्राम ,रखों अपनी धरती तमाम

हम वही ख़ुशी से खाएँगे,परिजन पर असि न उठाएंगे"

दुर्योधन वह भी दे न सका ,आशीष समाज की ले न सका
उल्टे हरी को बांधने चला ,जो था असाध्य साधने चला

जब नाश मनुज पर आता हैं ,पहले विवेक मर जाता हैं

"ज़ंजीर बढा अब साध मुझे ,हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे
ये देख गगन मुझमे लय हैं ,ये देख पवन मुझमे लय हैं
मुझमे विलीन झंकार सकल ,मुझमे लय हैं संसार सकल
अमरत्व फूलता हैं मुझमे ,संसार झूलता हैं मुझमे
उदयाचल मेरे दीप्त भाल ,भूमंडल वक्षस्थल विशाल
भुज परिधि बांध को घेरे हैं,मैनाक मेरु पग मेरे हैं
दीप्ते जो ग्रह नक्षत्र निकर ,सब हैं मेरे मुख के अन्दर
दृक हो तो दृश्य अखंड देख,मुझमे सारा ब्रह्माण्ड देख
चराचर जीव जग क्षर-अक्षर ,नश्वर मनुष्य सृजाती अमर
शत कोटि सूर्य शत कोटि चन्द्र ,शत कोटि सरित्सर सिन्धु मंद्र
शत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश ,शत कोटि जलपति जिष्णु धनेश
शत कोटि रुद्र शत कोटि काल ,शत कोटि दंड धर लोकपाल
ज़ंजीर बढा कर साध इन्हें ,हाँ हाँ दुर्योधन बाँध इन्हें
भूतल अतल पाताल देख ,गत और अनागत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन ,यह देख महाभारत का रण
मृतकों से पटी हुई भू हैं ,पहचान कहाँ इसमें तू हैं !!!


और अगर या नहीं दिया तो हमे कहना होगा


तो ले अब मैं भी जाता हूँ ,अंतिम संकल्प सुनाता हूँ  
 याचना नहीं अब रण होगा ,जीवन जय या की मरण होगा 

.जय श्री राम.

जिस हिन्दू ने नभ में जाकर, नक्षत्रों... को दी हे संज्ञा..!
जिसने हिमगिरी का वक्ष चीर, भू को दी हे पावन गंगा..!!
जिसने सागर की छाती पे, पाषाणों को तैराया हे..!
वर्तमान की पीड़ा को हर, जिसने इतिहास बनाया हे..!!
जिसके आर्यों ने घोष किया, क्रिन्वंतों विश्वार्यम का..!
जिसका गौरव कम कर न सकी, रावण की स्वर्णमयी लंका..!!
जिसके यज्ञों का एक हव्य, सौ सौ पुत्रों का जनक रहा..!
जिसके आँगन में भयाक्रांत, धनपति बरसाता कनक रहा..!!
जिसके पावन बलिष्ठ तन की रचना, तन दे दधीच ने की..!
राघव ने वन वन भटक भटक, जिस तन में प्राण प्रतिष्ठा की..!!
जौहर कुंडों में कूद-कूद, सतियों ने जिसे दिया सत्व..!
गुरुओं गुरुपुत्रों ने जिसमे, चिर्बलिदानी भर दिया तत्त्व...!!
वो शाश्वत हिन्दू जीवन क्या? स्मरणीय मात्र रह जाएगा..???
इसकी पावन गंगा का जल, क्या नालों में बह जाएगा...???
इसके गंगाधर शिवशंकर, क्या ले समाधी सो जायेंगे....???
इसके पुष्कर, इसके प्रयाग.. क्या गर्त मात्र हो जायेंगे....???
यदि तुम ऐसा नहीं चाहते, तो फिर तुमको जागना होगा..!!!
हिन्दू-राष्ट्र का बिगुल बजाकर, दानव-दल को डरना होगा..!!!

नेहरु की पीढ़ी -----

नेहरु की पीढ़ी -----

नेहरू से पहले और नेहरू के पहले....



नेहरू से पहले ....नेहरू की पीढ़ी इस प्रकार है ....

गंगाधर नेहरु GANGADHAR NEHARU

विद्याधर नेहरु VIDYADHAR NEHARU

मोतीलाल नेहरु MOTILAL NEHARU

जवाहर लाल नेहरु JAWAHAR LAL NEHARU



गंगाधर नेहरु (NEHARU) उर्फ़ GAYAS - UD - DIN SHAH जिसे GAZI की उपाधि दी गई थी ....जिसका मतलब होता है (KAFIR - KILLER)



इस गयासुद्दीन गाजी ने ही मुसलमानों को खबर (मुखबिरी ) दी थी की गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड में आये हुए हैं , इसकी मुखबिरी और पक्की खबर के कारण ही सिखों के दशम गुरु गोबिंद सिंह जी के ऊपर हमला बोला गया, जिसमे उन्हें चोट पहुंची और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई थी.



"Wazir Khan, the Nawab of Sirhind, felt uneasy about any conciliation between Guru Gobind Singh and Bahadur Shah '1'.

He commissioned two Pathans, Jamshed Khan and Wasil Beg, to assassinate the Guru.



The two secretly pursued the Guru and got an opportunity to attack him at Nanded.

According to Sri Gur Sobha by the contemporary writer Senapati, Jamshed Khan stabbed the Guru in the left side below the heart while he was resting in his chamber after the Rehras prayer.

Guru Gobind Singh killed the attacker with his sabre, while the attacker's fleeing companion was killed by the Sikhs who had rushed in on hearing the noise.

The European surgeon sent by Bahadur Shah stitched the Guru's wound. However, the wound re-opened and caused profuse bleeding, as the Guru tugged at a hard strong bow after a few days.

Seeing his end was near, the Dasham Guru declared the Granth Sahib as the next Guru of the Sikhs, as GURU GRANTH SAHIB.

He then sang his self-composed hymn:

"Agya bhai Akal ki tabhi chalayo Panth Sabh Sikhan ko hukam hai Guru Maneyo Granth, Guru Granth Ji manyo pargat Guran ki deh Jo Prabhu ko milbo chahe khoj shabad mein le Raj karega Khalsa aqi rahei na koe Khwar hoe sabh milange bache sharan jo hoe."



Translation of the above: "Under orders of the Immortal Being, the Panth was created. All the Sikhs are enjoined to accept the Granth as their Guru. Consider the Guru Granth as embodiment of the Gurus. Those who want to meet God, can find Him in its hymns. The pure shall rule, and impure will be no more, Those separated will unite and all the devotees shall be saved."



The Guru reportedly passed away, along with his horse Dilbagh (aka Neela Ghora) on 7 October 1708 at Nanded, before which he had declared the Guru Granth Sahib as his successor."



और आज नांदेड में सिक्खों का बहुत बड़ा तीर्थ-स्थान बना हुआ है. जब गयासुद्दीन को हिन्दू और सिक्ख मिलकर चारों और ढूँढने लगे तो उसने अपना बादल लिया और गंगाधर राव बन गया, और उसे मुसलमानों ने पुरस्कार के रूप में अलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में इशरत मंजिल नामक महल/हवेली  दिया, जिसका नाम आज आनंद भवन है ....आनंद भवन को आज अलाहाबाद में  kangress का मुख्यालय बनाया हुआ है

इशरत मंजिल के बगल से एक नहर गुजरा करती थी, जिसके कारण लोग गंगाधर को नहर के पास वाला, नहर किनारे वाला, नहर वाला, neharua , आदि बोलते थे जो बाद में गंगाधर नेहरु अपना लिखने लगा इस प्रकार से एक नया उपनाम अस्तित्व में आया नेहरु और आज समय ऐसा है की एक दिन अरुण नेहरु को छोड़कर कोई नेहरु नहीं बचा ...

अपने आप को कश्मीरी पंडित कह कर रह रहा था गंगाधर क्यूंकि अफगानी था और लोग आसानी से विश्वास कर लेते थे क्यूंकि कश्मीरी पंडित भी ऐसे ही लगते थे.

अपने आप को पंडित साबित करने के लिए सबने नाम के आगे पंडित लगाना शुरू कर दिया

पंडित गंगाधर नेहरु

पंडित विद्याधर नेहरु

पंडित मोतीलाल नेहरु

पंडित जवाहर लाल नेहरु लिखा ..



और यही नाम व्यवहार में लाते गए ...



पंडित जवाहर लाल नेहरु अगर कश्मीर का था तो आज कहाँ गया कश्मीर में वो घर आज तो वो कश्मीर में कांग्रेस का मुख्यालय होना चाहिए जिस प्रकार आनंद भवन कांग्रेस का मुख्यालय बना हुआ है इलाहाबाद में....

ये कहानी इतनी पुरानी भी नहीं है की इसके तथ्य कश्मीर में मिल न सकें ....

आज हर पुरानी चीज़ मिल रही है ....

चित्रकूट में भगवन श्री राम के पैरों के निशान मिले,

लंका में रावन की लंका मिली, उसके हवाई अड्डे, अशोक वाटिका, संजीवनी बूटी वाले पहाड़ आदि बहुत कुछ....

समुद्र में भगवान श्री कृष्ण भगवान् द्वारा बसाई गई द्वारिका नगरी मिली ,

करोड़ों वर्ष पूर्व की DINOSAUR के अवशेष मिले तो 150 वर्ष पुराना कश्मीर में नकली नेहरू का अस्तित्व ढूंढना क्या कठिन है ?????



दुश्मन बहुत होशिआर है हमें आजादी के धोखे में रखा हुआ है,

इस से उभरने के लिए इनको इन सब से भी बड़ी चुस्की पिलानी पड़ेगी जो की मेरे विचार से धर्मान्धता ही हो सकती है जैसे गणेश को दूध पिलाया था अन्यथा किसी डिक्टेटर को आना पड़ेगा या सिविल वार अनिवार्य हो जायेगा



जय हिंद जय हो

सूरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत। पुर्जा-पुर्जा कर मरे, कबहू ना छोड़े खेत।।

* साहिबजादे बाबा फतेह सिंह व जोरावर सिंह बने मिसाल

* गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबजादों की शहादत पर विशेष

 भारत वर्ष पर पठानों व मुगलों ने कई सौ साल तक राज किया। उन्होंने अपने राज की मजबूती व इस्लाम धर्म को भारत के कोने-कोने तक फैलाने के लिए हिंदुओं पर जुल्म करने शुरू कर दिए। औरंगजेब ने तो जुल्म करने की सभी हदें पार कर दी। हजारों मंदिर गिरा दिए गए। हिंदुओं को घोड़ी पर चढ़ना व पगड़ी बांधना निषेध कर दिया और एक खास टैक्स जिसको जजिया टैक्स कहा जाता था। हिंदु कौम में फूट व निर्बलता के कारण इन जुल्मों का विरोध नहीं हो रहा था। यहां तक कि राजपूतों ने अपनी बेटियों के रिश्ते भी मुगल राजाओं से शुरू कर दिए।

सूरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत।

पुर्जा-पुर्जा कर मरे, कबहू ना छोड़े खेत।।

सिख धर्म के दसवें गुरु साहिब गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह महसूस किया कि निर्बल हो चुकी हिंदु कौम में अलग से जीने की जागृति पैदा की जाए। उन्होंने 1699 में बिसाखी वाले दिन आनंदपुर साहिब में अमृत पान करा कर एक अनोखी कौम तैयार की। जिसका नाम खालसा पंथ रखा। मई-जून 1704 में दिल्ली की सेना, सरहिंद व लाहौर सूबे की सेना व बाईधार के पहाड़ी राजाओं ने मिलकर गुरु गोबिंद सिंह जी पर आक्रमण कर दिया। सिखों ने पूरी ताकत से मुकाबला किया व सात महीने तक आनंदपुर साहिब के किले पर कब्जा नहीं होने दिया। आखिर में मुसलमान शासकों ने कुरान की कसम खा व हिंदु राजाओं ने गऊ माता की कसम खाकर गुरु जी से किला खाली कराने के लिए विनती की। 20 दिसंबर 1704 की रात को किला खाली कर दिया गया और गुरु जी अपनी सेना के साथ रोपड़ की तरफ कूच कर गए। सुबह जैसे ही मुगल सेना को पता चला, उन्होंने कसमें तोड़ते हुए गुरु जी पर हमला कर दिया। लड़ते-लड़ते सिख सिरसा नदी पार कर गए व चमकौर गढ़ी में 37 सिखों व गुरुजी और उनके दो बड़े साहिबजादों ने मोर्चा संभाला। यह संसार की अदभुत जंग थी क्योंकि 80 हजार मुस्लमानों से केवल 40 सिखों का मुकाबला था। जब सिखों का गोला बारूद खत्म हो गया तो गुरु जी ने 5-5 सिखों का जत्था बनाकर मैदाने जंग में भेजने शुरू कर दिए। बड़े साहिबजादे भी लड़ाई में गुरु जी की आज्ञा लेकर शामिल हुए व 17 और 15 साल की छोटी उम्र में ही युद्ध में जोहर दिखा कर शहीद हो गए। लेकिन सिखों ने शाम तक कब्जा नहीं होने दिया। गुरु साहिब जी के तीरों के आगे मुगल सेना असहाय बनी रही। रात को पांच सिखों ने गुरु जी के पांच प्यारों की हैसियत में गढ़ी को छोड़ कर चले जाने का हुकम दिया। गुरु जी हुकम मानते हुए ताड़ी मार कर व ललकार करके माकीवोड़ को चले गए।

दूसरी तरफ सिरसा नदी पार करते समय गुरु जी की माता गुजरी जी व दोनों छोटे साहिबजादे बिछड़ गए। गुरु जी का रसोईया गंगू ब्राह्मण उन्हें अपने गांव सहेड़ी ले गया। रात को उसने माताजी की सोने की मोहरों वाली गठरी चोरी कर ली। सुबह माता जी के पूछने पर आग बबूला हो गया और उसने गांव के चौधरी को गुरु जी के बच्चों के बारे में बता दिया। दूसरे दिन गंगू व चौधरी ने मोरिंडा के हाकिम को भी बता दिया। हाकिम ने सरहिंद के नवाब के पास साहिबजादों व माता जी को भेज दिया। नवाब ने उन्हें ठंड़े बुरज में कैद कर दिया। दो तीन दिन तक उन बच्चों को मुसलमान बनने के लिए मजबूर किया गया। जब वे ना माने तो उन्हें डराया धमकाया गया। ऊंचे पदों व रिश्तों के प्रलोभन भी दिए गए। लेकिन साहिबजादे ना डरे, ना लोभ में अपना धर्म बदलना स्वीकार किया। सुचानंद दिवान ने नवाब को उकसाया कि यह सांप के बच्चे हैं इन्हें कत्ल कर देना चाहिए। अंत में काजी बुलाया गया जिसने जिंदे ही दीवार में चिन कर मार देने का फतवा दे दिया। उस समय दरबार में मलेर कोटले का नवाब शेर मुहम्मद खां भी उपस्थित था। उसने इस फतबे का विरोध किया और दरबार से उठ कर चला गया। 27 दिसंबर 1704 में फतवे अनुसार बच्चों को दीवारों में चिना जाने लगा। जब दीवार घुटनों तक पहुंची तो घुटनों की चपनियों को तेसी से काटा गया ताकि दीवार टेड़ी न हो। जुल्म की हद हो गई। सिर तक दीवार के पहुंचने पर शाशल बेग व वाशल बेग जलादों ने तलवार में शीश कर साहिब जादों को शहीद कर दिया। उनकी शहादत की खबर सुन कर दादी माता भी प्रलोक सिधार गई। लाशों को खेतों में फेंक दिया गया। सरहिंद के एक हिंदु साहूकार जी रोडरमल को जब इसका पता चला तो उसने संस्कार करने की सोची। उसको कहा गया कि जितनी जमीन संस्कार के लिए चाहिए उतनी जगह पर सोने की मोहरे बिछानी पड़ेगी। कहते हैं कि उसने घर के सब जेवर व सोने की मोहरें बिछा करके साहिबजादों व माता गुजरी का दाह संस्कार किया। संस्कार वाली जगह पर बहुत संदर गुरुद्वारा जोती स्वरूप बना हुआ है। जबकि शहादत वाली जगह पर भी एक बहुत बड़ा गुरुद्वारा सशोभित है।


हर साल दिसंबर 25 से 27 दिसंबर तक बहुत भारी जोड़ मेला इस स्थान पर (फतेहगढ़ साहिब) लगता है जिसमें 15 लाख श्रद्धालु पहुंच कर साहिबजादों को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। 6 व 8 साल के साहिबजादे बाबा फतेह सिंह और जोरावर सिंह जी दुनिया को बेमिसाल शहीदी पैगाम दे गए। वे दुनिया में अमर हो गए। साहिबजादों की शहीदी पर एक मुसलमान लेखिक ने कितना सुंदर वर्णन किया है- सद साल और जी के भी मरना जरूर था, सर कौम से बचाना यह गैरत से दूर था। मगर गुलाम मानसिकता के रोगी आज के इंडियन अपनी गरिमा और गौरव को भूलों मत याद रखो।

लव जेहाद : इस्लामिक आतंकवाद का शस्त्र -- कुछ बोलो शर्मनिर्पेक्षों

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भारत के विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम : हिंदुत्व के प्रति दुर्भावना

पिछले दिनों एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में किसी विषय का पाठ्यक्रम तैयार करने पर मीटिंग हो रही थी। उसमें एक बिंदु था-भारत में मानवतावादी परंपरा। एक प्रोफेसर ने प्रस्तावित किया कि इसके अंतर्गत लिखा जाए, 'बौद्ध, जैन, इस्लामी तथा सूफी विचार'। दूसरे प्रोफेसर ने चिता जताई, 'तब तो हिंदू भी लिखना पड़ेगा?' वह हिंदू जोड़ना नहीं चाहते थे। तब प्रस्तावक प्रोफेसर ने उत्तर दिया, 'हिंदू धर्म या विचार जैसी कोई चीज नहीं थी।' दूसरे प्रोफेसर ने फिर आशका व्यक्त की, 'मगर बौद्ध धर्म से पहले भारत में रहे चितन-विचार का भी तो उल्लेख करना होगा?' पहले प्रोफेसर ने बेफिक्री से कहा, 'अच्छा तो लिख दो, अर्ली इंडिया।' इस प्रकार, भारत में मानवतावादी परंपरा का क्रम इस प्रकार लिखा गया, 'अर्ली इंडियन, बुद्धिस्ट, जैन, इस्लामिक एंड सूफी।' अर्थात, जो स्थान हिंदू या सनातन धर्म को देना था वहां काल-सबधी नाम दिया गया, जबकि दूसरे धमरें वाले स्थान में धर्म-सबधी नाम ही दिए गए। वहां मेडिवल, लेटर-मेडिवल या प्री-मॉडर्न आदि लिखकर 'अर्ली' इंडिया वाला काल-क्रम नहीं रखा गया। अंतत: वही पाठ्यक्रम बन गया। पाठ्यक्रम समिति में देश भर से शामिल एक दर्जन प्रोफेसरों को इसमें कुछ भी अटपटा या दुराग्रही न लगा। भारत में हिंदू-विरोधी बौद्धिकता के दबदबे का यह नमूना आज का है।

आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज भारत के उच्च शिक्षार्थी भी अपने ही देश के दर्शन, इतिहास और सस्कृति से निपट अनजान हैं। यह इतने लबे समय से चल रहा है कि बड़ी कुर्सियों पर विराजमान अधिकारी, बुद्धिजीवी और प्रोफेसर भी नितात विखंडित दृष्टि रखते हैं। प्राय: विद्यार्थियों को इतिहास पढ़ाने के बजाय उनसे इतिहास छिपाया जाता है, ताकि भोले छात्रों को एक विशेष मतवाद में दीक्षित किया जा सके। उदाहरण के लिए एक इतिहास पुस्तक में बिना कोई जानकारी दिए वेदों के प्रति दुर्भावना भरी गई है। पुस्तक में जगह-जगह लिखा है, 'वेद कर्मकाडीय पुस्तक है', तो कहीं यह कि 'वेदों के प्रभुत्व को चुनौती दी गई।' मानो, वेद कोई दुष्ट सरदार थे! इसी पुस्तक के एक अध्याय का शीर्षक है, 'महाभारत का आलोचनात्मक अध्ययन', जिसमें चुन-चुन कर ऐसी कथाएं विचित्र भाव से दी गई हैं जिससे महाभारत का कुछ ज्ञान नहीं होता। केवल उसके प्रमुख पात्रों, तत्कालीन समाज और विचारों के प्रति एक वितृष्णा बनती है।

भारतीय सभ्यता-सस्कृति के प्रति ऐसे इतिहासकारों का दुराग्रह तब स्पष्ट हो जाता है जब वे अरब-इस्लाम का इतिहास लिखते हैं। उदाहरण के लिए विश्व इतिहास की एक पाठ्य-पुस्तक में एक-तिहाई सामग्री बाकायदा इस्लाम और उसके विस्तार पर दी गई है। श्रद्धा, प्रशसा से ओत-प्रोत उस भारी भरकम सामग्री में आरंभ में ही साफ लिखा है कि हमारी समझ पैगंबर की जीवनी, कुरान और हदीस पर आधारित है। अर्थात, जिस रूप में इस्लामी किताबें अपने को पेश करती हैं, प्रोफेसरों ने उसे आदर एव अतिरिक्त अनुशसा भाव से विद्यार्थियों तक पहुंचा दिया है। कहीं उस 'आलोचनात्मक अध्ययन' का नामो-निशान नहीं, जो महाभारत के लिए लिख कर घोषित किया था। 'वेदों के प्रभुत्व' की तरह कहीं कुरान के प्रभुत्व पर आक्रोश प्रेरित करने का जतन भी नहीं। उलटे प्रोफेसरों ने दर्जनों तस्वीरों, रेखाचित्रों, मानचित्रों के माध्यम से इस्लाम की खूबियों, महानता और शान का इतना लबा बखान किया है कि लगता है कि यह विश्व इतिहास की पाठ्य-पुस्तक नहीं, बल्कि किसी को इस्लाम में मतांतरित करने के लिए लिखा गया तबलीगी साहित्य हो! इतिहासकारों की यह पूरी श्रद्धा-भगिमा बाबर के बारे में इस उक्ति से झलक सकती है कि उसने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। मानो किसी बगीचे या पुस्तकालय की नींव रखने जैसा कार्य किया हो। पुस्तक में इस्लामी साम्राज्य विस्तार के लिए विभिन्न देशों पर चढ़ाई, सदियों तक हुए नरसहार, जिहाद, जबरन मतांतरण आदि मोटी बातों तक का उल्लेख नहीं है।

ये प्रोफेसर कोई चुने हुए अपवाद नहीं हैं। भारत में समाज विज्ञान और मानविकी विषयों में इसी बौद्धिकता का एकाधिकार है। इसीलिए जो प्रोफेसर हिंदू ग्रंथों, शास्त्रों, नीतिकारों, राज्य व्यवस्था आदि पर शत्रुता भाव से लिखते हैं वही इस्लामी किताबों, विचारों, पैगबर, उनके युद्धों, प्रसगों, राज्य व्यवस्था, रिवाजों और साम्राज्य विस्तार आदि पर लिखते हुए एकदम उलट कर श्रद्धा और स्वीकृति की मूर्ति में बदल जाते हैं। नि:सदेह यह कोई विद्वत लेखन नहीं कि दो प्रकार के ग्रंथों, विश्वासों, राज्य व्यवस्थाओं के बारे में दो विपरीत मानदंड अपनाए जाएं।

समाज विज्ञान शिक्षा को मतवादी प्रचार बना देने में राजनीति की बड़ी भूमिका है। इसीलिए बुद्धिजीवी खुले विचार-विमर्श और मुक्त चितन के कट्टर विरोधी हैं। वे देशभक्तिपूर्ण या हिंदू भाव से लिखे अच्छे लेखन को भी निदित करते हैं। उनमें स्वदेशी भाव की पुस्तकों, लेखों के प्रति तीखी नाराजगी रहती हैं। वे मौलिक शोध या लेखन से अधिक 'तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है, पार्टनर' वाली घातक मानसिकता में जीते हैं। कोई लेखन, विश्लेषण उन्हें नहीं रुचता, यदि वह उनके लिए राजनीति सगत न हो।

इस चिताजनक स्थिति को पहचानना और परखना जरूरी है। हमारे देश में प्रचलित समाज विज्ञान पुस्तकों की मूल्यवत्ता तुरंत समझ में आ जाएगी, यदि दूसरे उन्नत देशों, समाजों की इतिहास, राजनीति सबधी पाठ्य-पुस्तकों से इसकी तुलना करें। तब साफ झलकेगा कि हमारे देश का समाज विज्ञान मुख्यत: अपने ही देश के धर्म, सभ्यता, सस्कृति के प्रति वितृष्णा भरने का काम करता है। हर हाल में, समाज विज्ञान और मानविकी विषयों की शिक्षा को सचमुच हितकारी बनाने के लिए इसे हिंदू विरोधी मतवाद की गिरफ्त से मुक्त करना आवश्यक है।